शहतूत
शहतूत को ही बिहार में तूत के नाम से जाना जाता है इसकी दो प्रजातियां बिहार में खूब लोकप्रिय है एक प्रजाति की तस्वीर सामने है जो पहले लाल होती है और पकने के बाद काली हो जाती है दूसरी प्रजाति पकाने के बाद हरी से हल्की पीली हो जाती है।
गर्मियों के सीजन में यह फल खूब मिलता है लोगों ने तो अब इसकी उपयोगिता जानने के बाद गमले में भी लगना प्रारंभ कर दिया है पटना और हाजीपुर की नर्सरी में आपको शहतूत के हाइब्रिड पौधे आसानी से मिल जाते हैं जिन्हें आप गमले में भी लगा सकते हैंl
ग्रामीण इलाकों में लाल कलर वाली प्रजाति खूब फेमस है लोग इस फल को शौकिया तौर पर ही लगते हैं इसके औषधीय गुण से लोग अपरिचित ही हैं सोशल मीडिया की धमक बढ़ाने के बाद इस फल की गुणवत्ता के बारे में लोगों को जानकारी हुई है
इसके बाद बिहार में शहतूत के पेड़ व्यापक पैमाने पर लगाए गए है। जो रेड कलर वाला दांत होता है वह कच्चे में हल्का खट्टा होता है पकाने के बाद इसका कलर काला हो जाता है और यह रस से भर जाता है और खूब मीठा लगता है जबकि हरे कलर वाले का साइज थोड़ा बड़ा होता है तथा पकाने के बाद या पीला हो जाता है
रस इसमें भरपूर होता है इसका स्वाद और बढ़िया होता है बाजार में आपको शहतूत या तूत बिकते हुए शायद ही दिखे। लोग इसे शौकिया तौर पर ही अपने घर के आस-पास और बगीचे में लगाते हैं ग्रामीण इलाकों में भी इस घर के आस-पास ही लगाया जाता है
बिहार के कई इलाकों में इसका अचार भी बनाया जाता है। इसका अचार काफी खट्टा होता है जब शहत उट कच्चा होता है इस समय से तोड़कर इसका अचार बनाया जाता हैl
फिर धूप में सुख कर रख लिया जाता है यह सालों साल खराब नहीं होता। पेट रोग से ग्रसित लोगों के लिए शहतूत रामबाण दवा है खाली पेट का खाने से कई बीमारियां समाप्त हो जाती है
आयुर्वेद की जानकारी इस बात का दावा करते हैं कि अगर छोटे बच्चों को खाली पेट पका हुआ शहतूत खिलाया जाए तो फिर क्रीमी की दवा देने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

व्यावसायिक उपयोग नहीं होने के कारण इसका व्यावसायिक उत्पादन नहीं होता है पर ग्रामीण इलाकों के बाजार में आपको लाल और हरे कलर वाले शहतूत बिकते हुए जरूर दिख जाते हैं सीजन में। इसी के पत्ते पर रेशम के कीड़े पनपते हैंl
इस कारण से झारखंड और छत्तीसगढ़ में इसे रेशम के कीड़े वाला पेड़ माना जाता है।
कभी रो के मुस्कुराए
कभी मुस्कुरा के रो दिए
तेरी याद जब भी आई
तुझे भुला के रो दिए
एक तेरा ही नाम था जिसे
लिखे कई कई बार,
खुश हुए थे लिखकर फिर
उसे मिटा मिटा के रो दिए…!!😔
अक्सर मै पूछती उनसे,अर्पिता जी आपका divorce क्यों हुआ। हमेशा वो टाल जातीं।मुझे लगता शायद किसी लत का शिकार होगा या बेरोजगार। पर ऐसा कुछ नही था,सरकारी नौकरी थी पति की,अच्छे खानदान मे विवाह हुआ था उनका। एक बार उन्होने कहा “जरूरी नही सरकारी नौकरी और अच्छे खानदान के लड़के मे संस्कार अच्छे ही हो।”
उन्होने बताया,छोटी मोटी कहा- सुनी पर अक्सर कहता “सरकारी नौकरी है मेरी,तेरी जैसी दस ले आऊंगा।”ससुराल छोड़कर आते वक्त मैने उनसे कहा “अब तुम मेरी जैसी दस के साथ ही रहो।मैने उनसे आज तक divorce नही लिया है,कौन कोर्ट के चक्कर काटे।और ना ही बच्चे की परवरिश के लिए पैसा लिया।
जिन्दगी के पच्चीस साल गुजर गए। ना पति लेने आया ना वो गईं। बेटे की शादी हो चुकी है।बेटा पिता की शक्ल भी नही जानता,अर्पिता जी ने वापिस मायके आने के पश्चात बी-एड किया था,नौकरी हासिल करके बेटे को पढ़ाया लिखाया,कभी बेटे ने पिता के बारे मे माँ से कोई सवाल नही किया,ना ही पिता के पास जाने की इच्छा जाहिर की।पति ने दूसरा विवाह नही किया,ना ही अर्पिता जी ने।
पति ने रिटायर्मेंट के वक्त फोन किया,फोटो वगैरहा भी मांगे पर अर्पिता जी ने कुछ नही भेजा। उन्होंन सब ठुकरा दिया।
कभी कभी कुछ बातें किसी के दिल को इतना घायल कर देती हैं कि उसके आगे पैसा कोई मायने नही रखता और ना ही रिश्ता।कुछ भी बोलने से पहले सोचना जरूरी है,क्यों कि हर किसी मे सहन शक्ति हो, जरूरी नही।
(कहानी मात्र एक पक्ष को सुनने पर, मैं सत्यता का दावा नही करती)
बड़ी खूबसूरत थी वो,, रंग एकदम गोरा, तीखे नैन नक्श, बड़ी_ बड़ी आँखें, नाज़ुक सी देहयष्टि , हर दम होठों पर विराजमान मोहक मुस्कान, भोली भाली, वंदना नाम था उसका,,
जो भी एक बार देख ले उसे ,भूल ही नहीं सकता,, ऐसा कुछ था उसके व्यकित्व में,, लड़के आहें भरते कि एक नज़र तो देख ले जालिम,, पर वो इस सबसे बेपरवाह अपने में ही मस्त रहती,,
मेरा नया_ नया एडमिशन हुआ था कॉलेज में,, 2 -3 दिन में ही कई लड़कियों से परिचय हो गया,, मेरी क्लास फेलो थी रेणु,, उसी के पड़ोस में रहती थी वंदना,, हमारी जूनियर थी वो,,
रेणु का घर कॉलेज के रास्ते में पड़ता था,, अत: वो मेरे आने का इंतज़ार करती और फिर हम तीनों साथ साथ कॉलेज जाते,, इस तरह वंदना भी मेरी अच्छी सखी बन गयी,,
मेरे पापा का ट्रांसफ़र हो गया और हम दूसरे शहर चले गए,, उस समय फोन की सुविधा नहीं थी तो संपर्क पूरी तरह से टूट गया और सब अपनी दुनियां में खो गये,,
कई साल बाद वो अचानक बाजार में मिल गयी,, मेरा नाम ले कर आवाज़ दी उसने तो चौँक कर देखा मैंने,, ओह!! वंदना,, कितना सुखद आश्चर्य है यार,, तुम यहाँ कैसे,, माँग का सुर्ख सिंदूर उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा रहा था,,
अच्छा ये बता,, तू कहाँ रहती है,,
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पिता की तेरहवीं होने के कुछ दिन पश्चात् निखिल नें सावित्री से कहा “माँ मेरी छुट्टियाँ खत्म हो रहीं हैं। इस मंडे को मुझे ऑफिस ज्वाइन करना है।
मैं चाहता हूँ आप हमारे साथ चलें। दो दिन का समय है, आप तैयारी कर लें।”
सावित्री कुछ देर चुप रहीं, फिर एक गहरी साँस लेकर बोलीं “बेटा रात बहुत हो रही है। अभी तुम सो जाओ।कल बात करेंगे।”
निखिल के सोने जाने से पहिले वे खुद अपने कमरे में जाकर पलंग पर लेट गईं।
सावित्री पलंग पर लेट तो गईं, आँखें भी बंद कर ली, पर आँखें मूँद लेने भर से नींद आती है क्या? अतीत के बादल बरसते नहीं, टुकड़े -टुकड़े याद बनकर चलचित्र से घूमते हैं बंद आँखों के पटल पर।
इस घर में ब्याह के आये चालीस बरस हो गये। माँ- -बाबू,जेठजी-जिठानी,उनका छोटा बबुआ, (दो साल का रहा होगा)देवर, और ननद रानी।भरा- भरा घर, बड़ा सा घर।
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