सेक्स एक प्रेरक शक्ति है

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सेक्स एक प्रेरक शक्ति है

जो एक पुरुष और एक महिला को
अन्तरङ्ग सम्पर्क में लाती है।

सामान्य अनुभव को सन्तुष्ट करना

अधिकाँश लोगों के लिए
स्वस्थ और सुखद जीवन का
एक अनिवार्य हिस्सा है।

यौन गतिविधि एक बहुमुखी गतिविधि है
जिसमें तन्त्रिका तन्त्र, अन्तःस्त्रावी तन्त्र,
सम्वहनी तन्त्र और
विभिन्न प्रकार की सँरचनाएँ शामिल हैं

जो यौन उत्तेजना, सम्भोग और सन्तुष्टि में सहायक हैं।
हालाँकि अनिवार्य रूप से यह प्रजनन के लिए है,
यह खुशी का एक स्रोत भी रहा है,
एक प्राकृतिक आराम देने वाला,
यह किसी के लिंग की पुष्टि करता है,

किसी के आत्मसम्मान और पारस्परिक रूप से
सन्तोषजनक अन्तरङ्गता और रिश्ते के लिए
आकर्षण की भावना को मजबूत करता है॥

तेरे एहसास की खुशबू रग रग में समाई है
अब तु ही बता, क्या इसकी भी कोई दवाई है.

ख्वाहिशो ने ही भटकाये है..सारी जिंदगी के रास्ते
रूह तो उतरी थी ज़मीं पे मंजिल का पता लेकर

नही रहता कोई शख़्स अधूरा, किसी के भी बिना
वक़्त सारा गुज़र ही जाता है, कुछ खोकर कुछ पाकर

तेरी यादों के बिना सारी ज़िंदगी अधूरी है,
तू मिल जाये तो मानो सारी ज़िन्दगी पूरी है,

तेरे साथ जुड़ी हैं मेरी सारा जीवन की हर ख़ुशी,
बाकी सब के साथ हँसना तो बस मजबूरी है

इतनी चाहत के बाद भी तुझे एहसास ना हुआ
सपनो में ही सई मेरी बाहों में तेरे सिवा कोई और न रहा
.💓✍️

कांख के बाल

बहुत ही संवेदनशील अंग है शरीर का पहली बात तो इसे साफ रखिए बाल नही रखिए और साबुन से धोते रहिए ।
संभोग में यह अंग बहुत ही ज्यादा अपना अहम भूमिका निभाता है ।

इसपर हल्की उंगली से सहलाए , फिर जीभ से चाटे, जीभ से टिकलिंग भी करिए स्त्री पार्टनर को बहुत ही आनंद आता है और जल्द ही उत्तेजित और यो नि गीली होती हैं सही या गलत फ्रेंड्स ✍🏻😍

स्त्री प्रेम में रो सकती है,
किसी को धो भी सकती है।
स्त्री प्रेम में टूट सकती है,
रूठ सकती है

और किसी को कूट भी सकती है।
स्त्री प्रेम में डर सकती है,
मर सकती है
और किसी के एक दो धर भी सकती है।

स्त्री प्रेम में डरा सकती है
और डोके चरा भी सकती है।
स्त्री प्रेम में लजा सकती है,
किसी के कान नीचे बजा भी सकती है।

स्त्री प्रेम में ढल सकती है,
जल सकती है
और किसी को छल भी सकती है।

स्त्री प्रेम में झेल सकती है
तो किसी के साथ खेल भी सकती है।

आज की नारी सब पर भारी.
वो स्त्री है कुछ भी कर सकती है…!!
❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤

मौसम

मौसम बदला बदला सा लगता है
कहीं धूप कहीं छांव सा लगता है

शाम ढली रात हुई
झूम के आई नींदिया

सुबह हुई
गुलिस्तां में गाया पंछी
क्षितिज पर लालिमा छाई
अलसभोर में दिन सा लगता है

मौसम ……………….।
कभी आंधी चली
कभी बादल घिरा
चमकी बिजिलियां तो लगा
दिन हो गया
फूलों की पंखुड़ियां झरी
कलियों के होठों का रंगत बदला
सूखे पत्तों का गिरना
किसी के आने की आहट सा लगता है

मौसम बदला ……………।
इतिहास घड़ी की सूई है
घूम फिर कर आ ही जाती है
ताल किनारे खड़ा है पीपल
ब्रह्म डाल पर बैठा रहता है
कुमकुम रोड़ी नहीं र हे तो
मंदिर सूना सा लगता है

मौसम बदला…………….।
फटी है धरती
मृणाल इसी में सोया है
शहीदों के आंसू में खिलेगा कमल
होगी जब खुशी की बरसात
आएगी कमला घर घर
अभी लाया है ग्रीष्म उजली धोती
सिंगार उजड़ा उजड़ा सा लगता है
मौसम बदला..

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